पुराना नियम · रूत · अध्याय 1 / 4
रूत 1
1फिर ऐसा हुआ कि जिन दिनों में न्यायी लोग न्याय करते थे, उन दिनो में देश में अकाल पड़ा। तब यहूदा के बैतलहम का एक पुरुष अपनी पत्नी और अपने दो पुत्रों को साथ लेकर मोआब देश में प्रवासी होकर गया।
2उस पुरुष का नाम एलीमेलेक तथा उसकी पत्नी का नाम नाओमी था। उसके दो बेटे थे। उनके नाम महलोन और किल्योन थे। ये यहूदा के बैतलहम के रहनेवाले अर्थात् एप्राती थे। वे मोआब के देश में आकर वहाँ रहे।
3तब नाओमी का पति एलीमेलेक मर गया। और वह अपने दोनों पुत्रों के साथ रह गई।
4और उन्होंने एक-एक मोआबिन स्त्री ब्याह ली; एक का नाम ओर्पा और दूसरी का नाम रूत था। वे वहाँ लगभग दस वर्ष रहे।
5तब महलोन और किल्योन भी मर गए। तब वह स्त्री अपने दोनों पुत्रों और पति से रहित हो गई।
6तब वह अपनी बहुओं के साथ मोआब के देश से जाने को चली; क्याेंकि उसने सुना कि यहोवा ने अपने लोगों की सुधि लेकर उन्हें भोजन-वस्तु दी है।
7अतः वह उस स्थान से निकली जहाँ वह अपनी दोनों बहुओं के साथ रहती थी, और उन्होंने यहूदा के देश में लौट जाने का मार्ग लिया।
8तब नाओमी ने अपनी दोनों बहुओं से कहा, “जाओ, तुम अपने-अपने मायके लौट जाओ। और जैसा प्रेम-व्यवहार तुमने उनसे जो मर गए हैं और मुझसे किया है वैसा ही यहोवा तुम पर कृपा करे।
9यहोवा करे कि तुम फिर अपने-अपने पति के घर में विश्राम पाओ।” तब उसने उनको चूमा और वे चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी।
10और उन्होंने उससे कहा, “नहीं, हम तो निश्चय तेरे साथ तेरे लोगों के पास चलेंगी।”
11परन्तु नाओमी ने कहा, “हे मेरी बेटियो, लौट जाओ। तुम मेरे साथ क्यों जाओगी? क्या मेरी कोख में और भी पुत्र हैं जो तुम्हारे पति हों?
12हे मेरी बेटियों, जाओ, लौट जाओ! क्योंकि मैं पति करने को बूढ़ी हूँ। यदि मैं कहती भी कि मुझे आशा है, और आज की रात मेरा पति होता भी और पुत्र भी होते,
13तो क्या तुम उनके सयाने होने तक ठहरी रहतीं? और इस कारण क्या पति करने से रुकी रहतीं? नहीं, मेरी बेटियो, ऐसा न हो। मेरा दुःख तो तुम्हारे दुःख से बहुत बढ़कर है, क्योंकि यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है।”
14और वे फिर चिल्ला चिल्लाकर रो पड़ी। तब ओर्पा ने अपनी सास को चूमा, परन्तु रूत उससे लिपटी रही।
15तब उसने कहा, “देख, तेरी जेठानी तो अपने लोगों और अपने देवताओं के पास लौट गई है। अपनी जेठानी के पीछे लौट जा।”
16परन्तु रूत ने कहा, “मुझसे यह विनती न कर कि मुझे छोड़कर लौट जा, क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊंगी, और जहाँ तू टिके वहाँ मैं भी टिकूंगी। तेरे लोग मेरे लोग होंगे और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।
17जहाँ तू मरेगी वहाँ मैं भी मरूंगी और वहीं मुझे मिट्टी दी जाएगी। यदि मृत्यु के अतिरिक्त और किसी कारण मैं तुझसे अलग होऊं, तो यहोवा मुझसे वैसा ही वरन् उससे भी अधिक करे।”
18जब उसने देखा कि वह मेरे साथ चलने को दृढ़ है तो उसने उससे और अधिक न कहा।
19अतः वे दोनों चल पड़ीं और बैतलहम जा पहुंची। और ऐसा हुआ कि जब वे बैतलहम पहुंचीं तो उनके कारण सारे नगर में हलचल मच गई, और स्त्रियां पूछने लगीं, “क्या यह नाओमी है?”
20और उसने उनसे कहा, “मुझे नाओमी मत कहो मुझे मारा कहो, क्याेंकि सर्वशक्तिमान ने मुझे बड़ा दुःख दिया है।
21मैं भरी-पूरी गई थी, परन्तु यहोवा मुझे छूछी करके ले आया है। तुम मुझे नाओमी क्यों कहते हो जबकि यहोवा ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुःख दिया है?”
22अतः नाओमी अपनी मोआबिन बहू रूत के साथ लौटी, जो मोआब देश से लौट आई थी। वे जौ की फसल कटने के समय के आरम्भ में बैतलहम पहुंची।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)