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पुराना नियम · जकर्याह · अध्याय 4 / 14

जकर्याह 4

1इसके बाद जो स्वर्गदूत मुझसे बात कर रहा था, उसने आकर मुझे ऐसे जगाया जैसे किसी को नींद से जगाया जाए।

2फिर उसने मुझसे पूछा, “तू क्या देखता है?” मैंने उसे उत्तर दिया, “मैं सोने का बना हुआ एक दीवट देखता हू। उस पर एक कटोरा है और सात दीपक हैं, तथा उस पर के प्रत्येक दीपक की सात-सात नालियां है।

3उसके पास जैतून के दो वृक्ष भी हैं, एक तो कटोरे की दाहिनी ओर तथा दूसरा बाईर्ं ओर।”

4तब जो स्वर्गदूत मुझसे बात कर रहा था उससे मैंने पूछा, “हे मेरे प्रभु, ये क्या हैं?”

5अतः जो स्वर्गदूत मुझसे बात कर रहा था उसने मुझे उत्तर दिया, “क्या तू नहीं जानता कि ये क्या हैं?” तो मैंने कहा, “नहीं, मेरे प्रभु।”

6फिर उसने मुझसे कहा, “जरुब्बाबेल के लिए यहोवा का वचन यह हैः ‘न बल से न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा,’ सेनाओं का यहोवा यही कहता है।

7‘हे महापर्वत, तू क्या है? जरुब्बाबेल के सामने तू मैदान बन जाएगा, और जब वह भवन की चोटी का पत्थर लगाने वाला होगा तब “धन्य हो; धन्य हो!” की पुकार गूंज उठेगी।’”

8यहोवा का यह वचन भी मेरे पास पहुंचा,

9“इस भवन की नींव जरुब्बाबेल के हाथों ने डाली है, और उसी के हाथ इसको पूरा करेंगे। तब तू जानेगा कि सेनाओं के यहोवा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।

10क्योंकि छोटी बातों के दिन को किसने तुच्छ जाना है? जरुब्बाबेल के हाथ में साहुल देखकर ये सातों अर्थात् यहोवा की आंखें जो सारी पृथ्वी पर इधर-उधर देखती फिरती हैं अति आनन्दित होंगी।”

11तब मैंने उससे पूछा, “दीवट के दाहिने-बाएं जैतून के जो दो वृक्ष हैं, वे क्या हैं?”

12फिर दूसरी बार उससे पूछा, “वे जैतून की दो डालियां क्या हैं जो सोने की दो नालियों के बाजू में हैं और सुनहरा तेल उंडेलती रहती हैं?”

13अतः उसने मुझे उत्तर दिया, “क्या तू नहीं जानता, ये क्या हैं?” और मैंने कहा, “नहीं, मेरे प्रभु।”

14तब उसने कहा, “ये वे दो अभिषिक्त हैं जो समस्त पृथ्वी के प्रभु की सेवा-टहल करते है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)