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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 1 / 50

उत्पत्ति 1

1आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।

2पृथ्वी बेडौल और वीरान थी, और अथाह जल की सतह पर अन्धियारा था, और परमेश्वर का आत्मा जल की सतह पर मंडराता था।

3तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो,” और उजियाला हो गया।

4परमेश्वर ने देखा कि उजियाला अच्छा है, और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।

5और परमेश्वर ने उजियाले को दिन तथा अन्धियारे को रात कहा। तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

6फिर परमेश्वर ने कहा, “जल के बीच एक अन्तर हो, वह जल को जल से अलग करे।”

7तब परमेश्वर ने अन्तर स्थापित करके, अन्तर के नीचे के जल को अन्तर के ऊपर के जल से अलग किया, और ऐसा ही हो गया।

8और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।

9फिर परमेश्वर ने कहा, “आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे,” और ऐसा ही हो गया।

10परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ था उसको उसने समुद्र कहा। तब परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

11फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी वनस्पति उत्पन्न करे, अर्थात् पृथ्वी पर बीज वाले पौधे और अपनी-अपनी जाति के अनुसार फल देने वाले वृक्ष उगें, जिनके बीज उन्हीं में हो।” और ऐसा ही हो गया।

12और पृथ्वी से वनस्पति, अर्थात अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीज वाले पौधे और फलदायक वृक्ष उगे, जिनमें अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीज होते है। और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

13तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।

14फिर परमेश्वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिए आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों, और वे चिह्नों, नियत समयों, और दिनों तथा वर्षों के लिए हो।

15वे पृथ्वी पर प्रकाश देने के लिए आकाश के अन्तर में ज्योतियां ठहरे।” और ऐसा ही हो गया।

16तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं कि उनमें से बड़ी ज्योति दिन पर प्रभुता करे और छोटी ज्योति रात्रि पर प्रभुता करे। उसने तारागण भी बनाए।

17परमेश्वर ने उन्हें आकाश के अन्तर में इसलिए रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें,

18तथा दिन और रात्रि पर प्रभुता करें, और उजियाले को अन्धियारे से अलग रखे। और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

19तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया।

20फिर परमेश्वर ने कहा, “जल झुंड के झुंड जीव-जन्तुओं से अत्यधिक भर जाए और पृथ्वी के ऊपर आकाश के विस्तार में पक्षी उड़े।”

21और परमेश्वर ने विशालकाय समुद्री जल-जन्तुओं तथा प्रत्येक जीवित और तैरने- फिरनेवाले जन्तु की सृष्टि की, जिनकी भिन्न-भिन्न जातियों से जल बहुत ही भर गया, और इसी प्रकार हर एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्टि की, और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

22और परमेश्वर ने यह कह कर आशीष दी, “ फूलो-फलो और समुद्र के जल में भर जाओ, और पृथ्वी पर पक्षी बहुत ही बढ़े।”

23तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार पांचवां दिन हो गया।

24फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी हर एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वन-पशु, उसकी अपनी जाति के अनुसार उत्पन्न करे।” और ऐसा ही हो गया।

25और परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति-जाति के वन-पशुओं, जाति-जाति के घरेलू पशुओं, और भूमि पर रेंगेनवाले जाति-जाति के सब जन्तुओं को बनाया। और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

26फिर परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप में, अपनी समानता के अनुसार बनाए। और वे समुद्र की मछलियों और आकाश के पक्षियों पर तथा घरेलू पशुओं और सारी पृथ्वी और हर एक रेंगने वाले जन्तु पर जो पृथ्वी पर रेंगता है, प्रभुता करे।”

27और परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में सृजा, अपने ही स्वरूप में परमेश्वर ने उनको सृजा। उसने नर और नारी करके उनकी सृष्टि की।

28परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी, और उनसे कहा, “फूलो-फलो और पृथ्वी में भर जाओ और उसे अपने वश में कर लो, और समुद्र की मछलियों तथा आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर चलने-फिरने वाले प्रत्येक जीव-जन्तु पर अधिकार रखो।”

29फिर परमेश्वर ने कहा, “देखो, मैंने समस्त पृथ्वी का प्रत्येक पौधा जो बीज उत्पन्न करता है तथा प्रत्येक पेड़ जिस पर बीज वाले फल होते हैं, तुम्हें दिया है। सब तुम्हारे भोजन के लिए हो।

30तथा पृथ्वी के प्रत्येक पशु और आकाश के प्रत्येक पक्षी और पृथ्वी पर चलने-फिरने वाले प्रत्येक जन्तु अर्थात् प्रत्येक जिसमें जीवन का प्राण है-प्रत्येक को भोजन के लिए सब प्रकार के हरे पौधे दिए है।” और वैसा ही हो गया।

31तब परमेश्वर ने सब कुछ जो उसने बनाया था देखा। और देखो, वह बहुत अच्छा था। तब संध्या हुई, फिर सवेरा हुआ। इस प्रकार छठवां दिन हो गया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)