पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 40 / 66
यशायाह 40
1तुम्हारा परमेश्वर कहता है “मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति!”
2यरूशलेम से शान्ति की बात कहो; और उससे पुकार कर कहो कि तेरे युद्ध के दिन बीत गए, तेरा अधर्म दूर किया गया, यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है।”
3किसी की पुकार सुनाई दे रही हैः “जंगल में यहोवा के लिए मार्ग सुधारो; हमारे परमेश्वर के लिए मरुस्थल में राजमार्ग चौरस करो।
4प्रत्येक घाटी भर दी जाए और प्रत्येक पर्वत तथा पहाड़ी गिरा दी जाए; जो ऊबड़-खाबड़ है वह समतल और जो ऊंचा-नीचा है वह चौरस किया जाए;
5तब यहोवा का तेज प्रकट होगा और सब प्राणी उसको एक साथ देखेंगे, क्योंकि यहोवा ने ही यह कहा है।”
6एक वाणी सुनाई देती हैः “प्रचार कर।” उसने उत्तर दिया, “मैं क्या प्रचार करूं?”
7“प्रत्येक प्राणी घास है, और उसकी सारी शोभा मैदान के फूल के समान है। जब यहोवा का श्वास उस पर पड़ता है तो घास सूख जाती और फूल मुर्झा जाता है। निश्चय ही प्रजा घास है।
8घास तो सूख जाती और फूल मुर्झा जाता है, परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदा अटल रहेगा।”
9हे शुभ समाचार सुनानेवाली सिय्योन, ऊंचे पर्वत पर चढ़ जा! हे शुभ समाचार सुनानेवाली यरूशलेम, अत्यन्त ऊंचे शब्द से सुना, ऊंचे शब्द से सुना, मत डर! यहूदा के नगरों से कहो, “तेरा परमेश्वर यहां है!”
10देखो, प्रभु परमेश्वर सामर्थ्य के साथ आएगा, वह अपने भुजबल से प्रभुता करेगा। देखो, वह प्रतिफल देने आएगा, और उसका बदला देना भी उसके हाथ में है।
11वह चरवाहे के समान अपने झुंड को चराएगाः वह मेमनों को अपनी बाहों में समेट लेगा और गोद में लिए रहेगा तथा दूध पिलानेवाली भेड़ों को धीरे-धीरे ले चलेगा।
12किसने महासागर को चुल्लू से मापा और आकाश को बित्ते से नापा? तथा पृथ्वी की धूल को किसने नपुवे से मापा? पर्वतों को तराजू से और पहाड़ियों को कांटे से किसने तोला है?
13किसने यहोवा के आत्मा को मार्ग बताया अथवा उसका परामर्शदाता होकर उसको सिखाया?
14उसने किससे सम्मति ली और किसने उसको समझ दी है? किसने उसे समझाकर न्याय का मार्ग बता दिया और ज्ञान सिखाकर बुद्धि का मार्ग जता दिया है?
15देखो, जातियां तो मानो बाल्टी में की एक बूंद तथा पलड़ों पर की धूल के कण सदृश ठहरी है। देखो, वह द्वीपों को धूलिकणों के समान उठाता है।
16लेबनोन भी ईंधन के लिए अपर्याप्त होगा और उसके पशु होमबलि के लिए पर्याप्त न होंगे।
17समस्त जातियां उसके सामने नगण्य हैं, वे तो उसके लिए शून्य से भी कम और व्यर्थ ठहरी है।
18तब तुम परमेश्वर को किसके समान बताओगे? अथवा उसकी उपमा किससे दोगे?
19मूर्ति को तो कारीगर ढाल कर बनाता है। सुनार उसको सोने से मढ़ता तथा चांदी की जंजीर से सजाता है।
20जो व्यक्ति कंगाल होने के कारण इतना अर्पण नहीं कर सकता, वह ऐसी लकड़ी चुन लेता है जो सड़ती नहीं; तब वह अपने लिए एक निपुण कारीगर ढूंढ़ता है कि एक टिकाऊ मूर्ति बनाए।
21क्या तुम नहीं जानते? क्या तुमने नहीं सुना? क्या यह तुमको आरम्भ ही से नहीं बताया गया? क्या तुमने पृथ्वी की नीवँ पड़ने के समय से ही नहीं समझा?
22वही है जो भूमण्डल पर विराजमान है, जिसके सामने पृथ्वी के निवासी टिड्डों के समान हैं, जो आकाश को पर्दों के समान फैलाता और रहने के तम्बू के समान तान देता है।
23वही है जो राजाओं को रंक बना देता है, और पृथ्वी के न्यायियों को व्यर्थ ठहरा देता है।
24वे रोपे ही जाते, वे बेाए ही जाते, उनके ठूंठ भूमि में जड़ ही पकड़ पाते कि वह उन पर फूंक देता और वे सूख जाते, और आंधी उन्हें भूसे के समान उड़ा ले जाती है।
25उस पवित्र का वचन है कि तुम मुझे किसके समान बताओगे कि मैं उसके तुल्य हूं?
26अपनी आंखें उठाकर देखो कि किसने इन तारागणों की सृष्टि की है, कौन उनके गणों में से एक-एक की अगुवाई करता, और उन सबको नाम ले-लेकर बुलाता है। उसके विशाल सामर्थ्य और उसकी महाशक्ति के कारण उनमें से एक भी न छूटेगा।
27हे याकूब, तू क्यों कहने पाए और हे इस्राएल, तू क्यों दावे के साथ कहे कि मेरा मार्ग यहोवा से छिपा है, मेरा परमेश्वर मेरे न्याय की कुछ भी चिन्ता नहीं करता?
28क्या तुम नहीं जानते? क्या तुमने नहीं सुना? यहोवा सनातन परमेश्वर और समस्त पृथ्वी का सृष्टिकर्ता है। वह न थकता, न श्रमित होता है। उसकी बुद्धि अगम है।
29वह थके हुए को बल और शक्तिहीन को सामर्थ्य से भर देता है।
30तरुण तो थकते और श्रमित हो जाते हैं, और जवान ठोकर खाकर गिरते हैं,
31परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों के समान पंख फैलाकर ऊंचाई पर उड़ेंगे वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, वे चलेंगे पर थकेंगे नही।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)