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पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 64 / 66

यशायाह 64

1भला हो कि तू आकाश को फाड़कर उतर आए और पर्वत तेरे सामने काँप उठें!

2और जैसे अग्नि झाड़-झंखाड़ को जला देती या आग पानी को उबाल देती है, काश, तू अपने शत्रुओं पर अपना नाम ऐसा प्रकट करे कि जाति-जाति के लोग तेरी उपस्थिति से काँप उठें!

3जब तूने अद्भुत कार्य किए जिनकी हमने अपेक्षा भी न की थी तब तू उतर आया और पर्वत तेरे सामने काँप उठे थे।

4क्योंकि प्राचीनकाल ही से न किसी ने सुना, न ही कानों तक उसकी चर्चा पहुंची और न आंखों से किसी ने तुझे छोड़ ऐसे परमेश्वर को देखा जो अपनी बाट जोहने वालों के लिए कार्य करता हो।

5तू तो उससे मिला करता है जो धार्मिकता के कार्य करने से प्रसन्न होता और तेरे मार्गों पर चलते हुए तुझे स्मरण रखता है। देख, तू क्रोधित हुआ क्योंकि हमने पाप किया था। हमारी यह दशा तो बहुत समय से है अब क्या हमारा उद्धार हो सकता है?

6क्योंकि हम तो सबके सब अशुद्ध मनुष्य-के-से हैं, और हमारे धर्म के काम मैले चिथड़ों के समान हैं, हम सबके सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के काम हमें वायु के समान उड़ा ले जाते है।

7कोई नहीं जो तेरा नाम लेकर प्रार्थना करता हो, या तुझसे लिपट जाने के लिए तत्पर हो। तूने हमसे अपना मुख छिपा लिया है और हमको हमारे अधर्म के वश में छोड़ दिया है।

8परन्तु हे यहोवा, तू तो हमारा पिता है। हम मिट्टी हैं और तू हमारा कुम्हार है-हम सबके सब तेरे हाथ के कार्य है।

9हे यहोवा, अत्यधिक क्रोधित न हो, न ही अनन्तकाल तक हमारे अधर्म को स्मरण रख; देख, ध्यान दे, हम सब तो तेरी प्रजा के लोग है।

10तेरे पवित्र नगर निर्जन बन गए हैं, सिय्योन तो सुनसान और यरूशलेम उजाड़ हो गया है।

11हमारा पवित्र और शोभायमान मन्दिर जिसमें हमारे पूर्वज तेरी स्तुति करते थे, वह आग से फूंक दिया गया है; और हमारी सब बहुमूल्य वस्तुएं नष्ट हो गई है।

12हे यहोवा, क्या इन बातों के होते हुए भी तू अपने आपको रोके रहेगा? क्या तू शान्त रहकर हमें अत्यधिक पीड़ित करेगा?

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)