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पुराना नियम · योएल · अध्याय 2 / 3

योएल 2

1सिय्योन में नरसिंगा फूंको! मेरे पवित्र पर्वत पर ख़तरे का संकेत सुनाओ! देश के सब रहनेवाले थरथरा उठें, क्योंकि यहोवा का दिन आ रहा है, वरन् निकट ही है।

2वह अन्धकार और छाया का दिन, बादलों और घोर अन्धकार का दिन है। एक बड़ी और सामर्थी जाति, जिसके समान पीढ़ी-पीढ़ी में न तो कभी कोेई जाति हुई और न फिर कभी होगी, पर्वतों पर भोर के प्रकाश के समान फैल रही है।

3उनके आगे आगे-आगे जलाती, और उनके पीछे लपटें भस्म करती जाती है। देश उनके सामने अदन की बारी के समान है पर उनके पीछे उजाड़ स्थान है और उनसे कुछ भी नहीं बचता।

4उनका रूप घोड़ों के समान है। वे युद्ध के घोड़ों के समान दौड़े आते है।

5पर्वतों के शिखरों पर वे कूद रहे हैं और उनका कोलाहल रथों के खड़खड़ाने और खूंटी भस्म करती हुई आग की लपट की चटचटाहट के समान है। वह युद्ध के लिए तत्पर सामर्थीर् सेना के सदृश है।

6उनके सम्मुख जाति-जाति के लोग व्याकुल हो उठते और सबके चेहरे पीले पड़ जाते है।

7वे शूरवीरों के समान दौड़ते और सैनिकों के सदृश दीवारों पर चढ़ जाते और प्रत्येक अपनी कतार में चलता है और अपनी पंक्ति से अलग नहीं होता।

8वे एक दूसरे को ढकेलते नहीं, सब अपनी राह पर चलते हैं, और रक्षा-पंक्ति को चीरते समय भी वे अपनी पंक्ति नहीं तोड़ते।

9वे नगर पर टूट पड़ते, शहरपनाह पर दौड़ते, और घरों पर चढ़कर चोरों के समान खिड़कियों से घुस जाते है।

10उनके सामने पृथ्वी कांपती और आकाश थरथराता है, सूर्य और चन्द्रमा काले हो जाते हैं, और तारों का प्रकाश जाता रहता है।

11यहोवा अपनी सेना के सामने अपनी वाणी सुनाता है। निश्चय उसकी सेना बहुत बड़ी है, क्योंकि अपना वचन पूरा करने वाला पराक्रमी है, निश्चय ही यहोवा का दिन बड़ा और अति भयानक है। कौन उसे सह सकता है?

12परन्तु अभी भी यहोवा की यह वाणी है, कि सम्पूर्ण हृदय से और उपवास के साथ रोते-पीटते हुए मेरी ओर फिरो।

13अपने वस्र नहीं, अपना मन ही फाड़कर अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो, क्योंकि वह अनुग्रहकारी, दयालु, विलम्ब से क्रोध करने वाला करफ़णा-निधान है और दुख देकर हाथ रोक लेता है।

14क्या जाने वह फिर कर तरस खाए और आशीष छोड़ जाए जिससे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा के लिए अन्नबलि और अर्घ फिर से चढ़ाए जाएं?

15सिय्योन में नरसिंगा फूंको, उपवास का दिन ठहराओ, पवित्र सभा घोषित करो।

16लोगों को जमा करो, सभा को पवित्र करो, प्राचीनों को इकट्ठा करो, बच्चों और दूधपिउवों को भी जमा करो। दूल्हा अपने कक्ष में से और दुल्हन अपनी कोठरी में से निकल आए।

17याजक जो यहोवा के सेवक हैं वे वेदी और ओसारे के बीच रो-रोकर कहें कि हे यहोवा, अपने लोगों पर करफ़णा कर और अपनी मीरास को निन्दा का कारण अर्थात् अन्यजातियों में उपमा न होने दे। देश देश के लोगोें में यह क्यों कहा जाए कि इनका परमेश्वर कहां है?

18तब यहोवा को अपने देश के लिए जलन होगी और वह अपनी प्रजा पर तरस खाएगा।

19और यहोवा अपने लोगों से कहेगा कि सुनो, मैं तुमको अन्न, दाखरस और तेल दूंगा, और तुम उनसे तृप्त हो जाओगे और मैं अन्यजातियों में तुम्हारी निन्दा फिर कभी न होने दूंगा,

20पर उत्तर की सेना को तुमसे दूर करूंगा और उसे सूखे और उजाड़ देश में भगा दूंगा और उसकी अगली टुकड़ी को पूर्वी समुद्र में तथा पिछली टुकड़ी को पश्चिमी समुद्र में डाल दूंगा, और उससे दुर्गन्ध उठेगी और उसकी सड़ी गन्ध फैलेगी, क्योंकि उसने भयंकर काम किए है।

21हे देश, मत डर, आनन्दित और मग्न हो, क्योंकि यहोवा ने महान् कार्य किए है।

22हे वन-पशुओ, मत डरो, क्योंकि जंगल की चराइयां हरी-भरी हो गई हैं, वृक्षों में फल लगे हैं, अंजीर और अंगूर बहुतायत से फले है।

23हे सिय्योन के लोगो, आनन्द मनाओ। अपने परमेश्वर यहोवा में मग्न हो, क्योंकि तुम्हें स्वीकार करने के प्रमाण स्वरूप उसने पहली बरसात दी है, पूर्वकाल के समान उसने वर्षा अर्थात् पहली और पिछली बरसात भेजी है।

24तब खलिहान अन्न से भर जाएंगे और रसकुंडों में नया दाखमधु और तेल छलक उठेगा।

25जिन वर्षों की उपज को दलवाली, रेंगने वाली, उजाड़ने वाली, और कुतरने वाली टिड्डियों ने अर्थात् मेरे भेजे हुए बड़े दल ने खा लिया था, उनकी हानि मैं तुमको भर दूंगा।

26तब तुम्हारे पास बहुतायत से खाने को रहेगा और तुम तृप्त होगे और अपने परमेश्वर यहोवा के नाम की स्तुति करोगे जिसने तुम्हारे लिए अद्भुत कार्य किए है। तब मेरे लोग कभी लज्जित न होंगे।

27इस प्रकार तुम जान लोगे कि मैं इस्राएल के मध्य हूं और मैं ही तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं, और कोई नही। मेरी प्रजा कभी लज्जित न होगी।

28और इसके बाद मैं सब लोगों पर अपना आत्मा उंडेलूंगा। तुम्हारे पुत्र और पुत्रियां नबूवत करेंगी। तुम्हारे वृद्ध जन स्वप्न देखेंगे और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।

29मैं अपने दासों और दासियों पर भी उन दिनों में अपना आत्मा उंडेलूंगा।

30मैं आकाश में और पृथ्वी पर अद्भुत कार्य करूंगा अर्थात् लहू और अग्नि तथा धुएं के खम्भे दिखाऊंगा।

31यहोवा के महान् और भयानक दिन के आने से पहले सूर्य अन्धकार में और चन्द्रमा लहू में बदल जाएगा।

32और ऐसा होगा कि जो कोई यहोवा का नाम लेगा वह उद्धार पाएगा, क्योंकि सिय्योन पर्वत पर और यरूशलेम में, जैसा यहोवा ने कहा है, उद्धार पाने वाले होंगे, अर्थात् बचने वाले जिन्हें यहोवा ने बुलाया है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)