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नया नियम · रोमियों · अध्याय 3 / 16

रोमियों 3

1तब यहूदी को क्या लाभ? अथवा ख़तने का क्या उपयोग?

2हर प्रकार से बहुत कुछ। प्रथम तो यह कि परमेश्वर के वचन उन्हें सौंपे गए।

3यदि कुछ लोगों ने विश्वास नहीं भी किया तो क्या हुआ? क्या उनका अविश्वास परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को व्यर्थ ठहराएगा?

4कदापि नहीं! वरन् परमेश्वर ही सच्चा ठहरे, चाहे प्रत्येक व्यक्ति झूठा पाया जाए, जैसा कि लिखा है, “कि तू अपनी बातों में खरा, और अपने न्याय में सच्चा ठहरे।”

5परन्तु यदि हमारी अधार्मिकता परमेश्वर की धार्मिकता को प्रदर्शित करती है, तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर जो कोप करता है, अन्यायी हैं?-यह तो मैं मनुष्यों के अनुसार कह रहा हूँ-

6कदापि नहीं! अन्यथा परमेश्वर जगत का न्याय कैसे करेगा?

7परन्तु यदि मेरे झूठ के द्वारा परमेश्वर का सत्य उसकी महिमा के लिए और भी अधिकता से हुआ, तो फिर क्यों मैं अब भी एक पापी के रूप में दण्ड के योग्य ठहराया जा रहा हूँ?

8जैसा कि हम पर झूठा आरोप लगाया भी जाता है, और कुछ लोग तो निश्चयपूर्वक कहते हैं कि हम ऐसा कहते है और हम क्यों न कहें “आओ, हम बुराई करें जिससे भलाई निकले”? उनका दोषी ठहराया जाना उचित है।

9तो क्या हुआ? क्या हम उनसे अच्छे हैं? कदापि नहीं; क्योंकि हम यहूदियों और यूनानियों दोनों पर दोष लगा चुके हैं कि वे सब के सब पाप के वश में हैं;

10जैसा कि लिखा है, “कोई धर्मी नहीं, एक भी नही।

11कोई समझदार नही। कोई भी नहीं जो परमेश्वर को खोजता हो।

12सब भटक गए हैं, वे सभी निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नही।

13उनका गला खुली वफ़ब्र है, वे अपनी जीभ से धोखा देते रहते हैं, उनके होंठो के नीचे सर्पों का विज है;

14उनका मुख शाप और कड़वाहट से भरा हुआ है;

15उनके पैर लहू बहाने को तत्पर रहते हैं,

16उनके मार्गों में विनाश और क्लेश है,

17और उन्होंने शान्ति का मार्ग जाना ही नही।

18उनकी आंखों के समक्ष परमेश्वर का भय है ही नही।”

19अब हम जानते हैं कि व्यवस्था जो कुछ कहती है, उन्हीं से कहती है जो व्यवस्था के अधीन हैं, इसलिए कि प्रत्येक मुंह बन्द किया जाए और समस्त संसार परमेश्वर के प्रति उत्तरदायी ठहरे;

20क्योंकि उसके सामने कोई प्राणी व्यवस्था के कार्याें से धर्मी नहीं ठहरेगा; क्योंकि व्यवस्था के द्वारा पाप का बोध होता है।

21परन्तु अब व्यवस्था से पृथक परमेश्वर की धार्मिकता प्रकट हुई है, जिसकी साक्षी व्यवस्था और नबी देते हैं,

22अर्थात् परमेश्वर की वह धार्मिकता जो यीशु मसीह में विश्वास द्वारा सब विश्वास करनेवालों के लिए है; यहां कोई भेद-भाव नहीं;

23इसलिए कि सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं,

24वे उसके अनुग्रह ही से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते है।

25उसी को परमेश्वर ने उसके लहू में विश्वास के द्वारा प्रायशिचत ठहराकर खुल्लमखुल्ला प्रदर्शित किया। यह उसकी धार्मिकता को प्रदर्शित करने के लिए हुआ, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी सहनशीलता में, पहले किए गए पापों को भुला दिया;

26जिससे कि वर्तमान समय में अपनी धार्मिकता प्रदर्शित करके वह स्वयं ही धर्मी ठहरे और उसका भी धर्मी ठहराने वाला हो जो यीशु पर विश्वास करता है।

27अतः गर्व करना कहां रहा? वह तो रहा ही नही। किस प्रकार की व्यवस्था से? कर्मों की व्यवस्था से? नहीं, परन्तु विश्वास की व्यवस्था से।

28इसलिए हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, वरन् विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाता है।

29या, परमेश्वर केवल यहूदियों ही का परमेश्वर है? क्या वह गै़रयहूदियों का भी परमेश्वर नहीं? हां, गैर यहूदियों का भी है-

30वास्तव में यदि परमेश्वर एक ही है-तो वह ख़तना वालों को विश्वास से तथा ख़तनारहितों को भी विश्वास ही के द्वारा धर्मी ठहराएगा।

31तो क्या हम विश्वास के द्वारा व्यवस्था को विफल करते हैं? कदापि नहीं! इसके विपरीत, हम व्यवस्था को दृढ़ करते है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)