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पुराना नियम · श्रेष्ठगीत · अध्याय 2 / 8

श्रेष्ठगीत 2

1मैं शारोन का गुलाब और घाटियों की सोसन हू।

2जैसे सोसन काँटों के मध्य, वैसे ही मेरी प्रियतमा कुंवारियों के मध्य है।

3जैसे सेब का वृक्ष जंगल के वृक्षों के मध्य वैसे ही मेरा प्रियतम युवकों के मध्य है। मैं उसकी छाया में अत्यधिक प्रसन्न हुई, और बैठ गई, और उसका फल मुझे स्वाद में बहुत मीठा लगा।

4वह मुझे भोज-गृह में ले आया है, और उसकी प्रेम की ध्वजा मुझ पर फहरा उठी।

5मुझे किशमिश की टिकियों से जिलाए रख, और सेबों से ताजगी दे, क्योंकि मैं प्रेम-रोगिन हू।

6उसका बायां हाथ मेरे सिर के नीचे हो और उसका दायां हाथ मेरा आलिंगन करे।

7हे यरूशलेम की पुत्रियो, मैं तुमसे चिकारियों और मैदान की हरिणियों की शपथ दिलाकर कहता हूं, जब तक प्रेम स्वतः न जाग उठे, तब तक तुम उसे न जगाना और न उकसाना।

8सुनो मेरे प्रियतम का शब्द! देखो, वह पर्वतों पर चढ़ता, पहाड़ियों पर कूदता-फांदता आ रहा है,

9मेरा प्रियतम चिकारे या युवा हरिण के समान है। देखो, वह हमारी दीवार के पीछे खड़ा है, वह खिड़कियों में से ताक रहा है, वह झंझरी में से झांक रहा है।

10मेरे प्रियतम ने उत्तर दिया और मुझसे कहा, “हे मेरी प्रियतमा, उठ। हे मेरी सुन्दरी, मेरे साथ चल।

11देख, शीत ट्टतु बीत गई है और वर्षा आकर चली गई है।

12भूमि पर फूल खिल चुके है। दाखलताओं की छंटनी का समय आ चुका है, और हमारे देश में पडुंक की बोली सुनी जा चुकी है।

13अंजीर के वृक्षों पर अंजीर पक चुके हैं और दाखलताओं पर खिले फूल अपने सौरभ बिखेर चुके है। उठ, मेरी प्रियतमा, मेरी सुन्दरी। आ, मेरे साथ चल।

14ओ मेरी कबूतरी! चट्टानों की दरारों में, सीधी ऊंची चढ़ाइयों के गुप्त स्थान में, मैं तेरा रूप देख पाऊं? मैं तेरी वाणी सुन पाऊं? क्योंकि तेरी वाणी मधुर है और तेरा रूप मनोहर है।”

15हमारे लिए लोमड़ियों को पकड़ ले, उन छोटी लोमड़ियों को जो दाख की बारियों को उजाड़ती हैं क्योंकि हमारी दाखलताओं में फूल लगे है।

16मेरा प्रियतम मेरा है, और मैं उसकी हू। वह सोसनों के मध्य अपने झुंड चराता है।

17जब तक दिन ठंडा न हो और छाया लम्बी होकर मिट न जाए, तब तक हे मेरे प्रियतम, उस चिकारे व जवान हरिण के समान बन, जो बेतेर के पर्वतों पर फिरता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)