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नया नियम · याकूब · अध्याय 1 / 5

याकूब 1

1परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब का उन बारहों गोत्रों को नमस्कार पहुंचे जो तितर-बितर होकर रहते है।

2हे मेरे भाइयो, जब तुम विभिन्न परीक्षाओं का सामना करते हो तो इसे बड़े आनन्द की बात समझो,

3यह जानते हुए कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है,

4पर धीरज को अपना पूरा कार्य करने दो कि तुम पूर्ण तथा सिद्ध हो जाओ, जिससे कि तुम में किसी बात की कमी न रहे।

5यदि तुम में से किसी को बुद्धि की कमी हो तो वह परमेश्वर से मांगे और उसे दी जाएगी, क्योंकि वह प्रत्येक को बिना उलाहना दिए उदारता से देता है।

6पर विश्वास से मांगे और तनिक भी सन्देह न करे, क्योंकि जो सन्देह करता है वह समुद्र की लहर के समान है, जो हवा से उठती और उछलती है।

7ऐसा मनुष्य यह आशा न रखे कि उसे परमेश्वर से कुछ प्राप्त होगा,

8क्योंकि दुचित्ता होने के कारण वह अपनी सारी चाल में अस्थिर है।

9वरन् दीन भाई अपने उच्च पद पर गर्व करे,

10और धनी अपनी हीन दशा पर, क्योंकि वह घास के फूल की भांति समाप्त हो जाएगा।

11सूर्य उदय होते ही कड़ी धूप पड़ती है और घास को सुखा देती हैः उसका फूल झड़ जाता है और उसकी सुन्दरता जाती रहती है। इसी प्रकार धनी भी धन के लिए परिश्रम करते हुए धूल में मिल जाएगा।

12धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि खरा निकल कर वह जीवन के उस मुकुट को प्राप्त करेगा जिसे प्रभु ने अपने प्रेेम रखने वालों को देने की प्रतिज्ञा की है।

13कोई भी व्यक्ति परीक्षा के समय यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्वर की ओर से है। क्योंकि बुरी बातों से न तो परमेश्वर की परीक्षा की जा सकती है और न वह स्वयं किसी की परीक्षा करता है।

14परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाजा द्वारा खिंचकर व फंसकर परीक्षा में पड़ता है।

15जब अभिलाजा गर्भवती होती है तो पाप को जनती है, और जब पाप हो जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।

16मेरे प्रिय भाइयो, धोखा न खाओ।

17प्रत्येक अच्छी वस्तु और हर एक उत्तम दान तो ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जो कभी बदलता नहीं और न छाया के समान परिवर्तनशील है।

18उसने अपनी ही इच्छा से सत्य के वचन के द्वारा हमें जन्म दिया जिस से हम उसके सृजे गए प्राणियों में मानो प्रथम फल हो।

19हे मेरे प्रिय भाइयो, यह तो तुम जानते ही हो। अतः प्रत्येक व्यक्ति सुनने के लिए तो तत्पर, बोलने में धीरजवन्त, और क्रोध करने में धीमा हो।

20क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर की धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता।

21इसलिए सारी मलिनता तथा समस्त दुष्टता को दूर करके उस वचन को नम्रतापूर्वक ग्रहण कर लो जो तुम में बोया गया है और जो तुम्हारे प्राणों को बचा सकता है।

22परन्तु अपने आप को वचन पर चलने वाले प्रमाणित करो, न कि केवल सुनने वाले जो स्वयं को धोखा देते है।

23यदि कोई मनुष्य वचन का सुनने वाला हो, और उस पर चलने वाला न हो तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना प्राकृतिक मुख दर्पण में देखता है।

24जब वह अपने आप को देखकर चला जाता है तो तुरन्त भूल जाता है कि मैं कैसा था।

25परन्तु जो व्यक्ति स्वतन्त्रता की सिद्ध व्यवस्था को लगन से देखता रहता है और उस पर बना रहता है, वह सुन कर भूल नहीं जाता, वरन् फलप्रद कार्य करता है-इसलिए वह आशिज पाएगा।

26यदि कोई अपने आप को भक्त समझे और अपनी जीभ पर लगाम न लगाए पर अपने हृदय को धोखा दे, तो उसकी भक्ति व्यर्थ है।

27हमारे परमेश्वर और पिता के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है कि अनाथों और विधवाओं की व्यथा में उनकी सुधि लें, और अपने आप को संसार से निष्कलंक रखे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)