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नया नियम · मत्ती · अध्याय 5 / 28

मत्ती 5

1इस भीड़ को देखकर वह पर्वत पर चढ़ गया, और जब वह बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

2तब वह अपना मुंह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगाः

3“धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

4धन्य हैं वे जो शोक करते हैं, क्योंकि वे सांत्वना पाएंगे।

5धन्य हैं वे जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के उत्तराधिकारी होंगे।

6धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएंगे।

7धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

8धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

9धन्य हैं वे जो मेल कराने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे।

10धन्य हैं वे जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

11धन्य हो तुम, जब लोग मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, तुम्हें यातना दें और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरुद्ध सब प्रकार की बातें कहें-

12आनन्दित और मग्न हो, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हारा प्रतिफल महान् है। उन्होंने तो उन नबियों को भी जो तुमसे पहले हुए इसी प्रकार सताया था।

13“तुम पृथ्वी के नमक हो। पर यदि नमक अपना स्वाद खो बैठे तो वह फिर किस से नमकीन किया जाएगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए।

14तुम जगत की ज्योति हो। पर्वत पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता।

15लोग दीपक को जलाकर टोकरी के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं और वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है।

16तुम्हारा प्रकाश मनुष्यों के सम्मुख इस प्रकार चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, महिमा करे।

17“यह न समझो कि मैं व्यवस्था या नबियों की पुस्तकों को नष्ट करने आया हूँ। नष्ट करने नहीं, परन्तु पूर्ण करने आया हूँ।

18क्योंकि मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं, व्यवस्था में से एक मात्र या बिन्दु भी, जब तक कि सब कुछ पूरा न हो जाए, नहीं टलेगा।

19इसलिए जो भी इन छोटी से छोटी आज्ञाओं को तोड़ेगा और ऐसी ही शिक्षा दूसरों को देगा, वह परमेश्वर के राज्य में छोटे से छोटा कहलाएगा; परन्तु जो उनका पालन करेगा और दूसरों को भी सिखाएगा, वह परमेश्वर के राज्य में महान् कहलाएगा।

20क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तो तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश न कर पाओगे।

21“तुम सुन चुके हो कि पूर्वजों से कहा गया था, ‘हत्या न करना’ और ‘जो हत्या करेगा, वह न्यायालय में दण्ड के योग्य ठहरेगा।’

22पर मैं तुमसे कहता हूँ कि हर एक जो अपने भाई पर क्रोधित होगा वह न्यायालय में दण्ड के योग्य ठहरेगा; और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह सर्वोच्च न्यायालय में दोषी ठहरेगा; और जो कोई कहेगा, ‘अरे मूर्ख,’ वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।

23इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए और वहां तुझेे स्मरण आए कि मेरे भाई को मुझ से कोई शिकायत है,

24तो अपनी भेंट वेदी के सामने छोड़ दे और जाकर पहले अपने भाई से मेल कर ले और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।

25जबकि तू अपने वादी के साथ मार्ग पर ही है तो उससे शीघ्र मित्रता कर ले, कहीं ऐसा न हो कि वादी तुझे न्यायाधीश को सौंप दे, और न्यायाधीश तुझे अधिकारी को, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए।

26मैं तुझ से सच कहता हूँ, जब तक तू पैसा-पैसा चुका न देगा तब तक वहां से छूटने न पाएगा।

27“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘व्यभिचार न करना,’

28परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो कोई किसी स्त्री को कामुकता से देखे, वह अपने मन में उससे व्यभिचार कर चुका।

29यदि तेरी दाहिनी आंख तुझ से पाप करवाए तो उसे निकालकर दूर फेंक दे, क्योंकि तेरे लिए यही उत्तम है कि तेरे अंगों में से एक नाश हो इसकी अपेक्षा कि तेरा सारा शरीर नरक में डाला जाए।

30यदि तेरा दाहिना हाथ तुझ से पाप करवाए तो उसे काटकर दूर फेंक दे, क्योंकि तेरे लिए यही उत्तम है कि तेरा एक अंग नाश हो जाए, अपेक्षा इसके कि तेरा सारा शरीर नरक में डाला जाए।

31यह कहा गया थाः ‘जो कोई अपनी पत्नी को तलाक देना चाहे वह उसे त्याग-पत्र दे,’

32परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि प्रत्येक जो व्यभिचार को छोड़ अन्य किसी कारण से अपनी पत्नी को तलाक देता है, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है। और जो कोई किसी तलाक दी हुई से विवाह करता है, वह व्यभिचार करता है।

33“फिर, तुम सुन चुके हो कि पूर्वजों से कहा गया था, ‘तुम झूठी शपथ न खाना, पर प्रभु के लिए अपनी शपथें पूरी करना।’

34परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि कभी शपथ न खाना; न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह परमेश्वर का सिंहासन है;

35न ही धरती की, क्योंकि वह उसके चरणों की चौकी है; न ही यरूशलेम की, क्योंकि यह महाराजाधिराज का नगर है।

36अपने सिर की भी शपथ न खाना, क्योंकि तू अपने एक बाल को भी सफेद या काला नहीं कर सकता।

37परन्तु तुम्हारी बात हां की हां अथवा नहीं की नहीं हो, क्योंकि जो कुछ इनसे अधिक होता है, शैतान की ओर से होता है।

38“तुमने सुना है कि कहा गया था, ‘आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत।’

39परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना वरन् जो तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।

40और यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे तो उसे कोट भी ले लेने दे।

41और यदि कोई तुझे बेगार में एक किलोमीटर ले जाए तो उसके साथ दो किलोमीटर चला जा।

42जो तुझ से मांगे उसे दे, और जो तुझ से उधार लेना चाहे उससे मुंह न मोड़।

43“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘तू अपने पड़ोसी से प्रेम करना और शत्रु से बैर।’

44परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ, अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम्हें सताते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो

45जिससे कि तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान बन सको, क्योंकि वह अपना सूर्य भलों और बुरों दोनों पर उदय करता है, और धर्मियों तथा अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है।

46क्योंकि यदि तुम उनसे प्रेम रखते हो जो तुमसे प्रेम रखते हैं तो तुम्हें क्या प्रतिफल मिलेगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?

47यदि तुम केवल अपने भाइयों को ही नमस्कार करते हो तो कौन सा बड़ा कार्य करते हो? क्या ग़ैरयहूदी भी ऐसा ही नहीं करते?

48अतः तुम सिद्ध बनो, जैसा कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)